{12th Biology}डार्विन के जैव विकास के सिद्धान्त का वर्णन

डार्विन के जैव विकास के सिद्धान्त का वर्णन जैव विकास प्रारम्भिक निम्न कोटि के सरल जीवों से क्रमिक परिवर्तनों द्वारा, अधिक विकसित एवं जटिल जीवों की उत्पत्ति को जैव विकास कहते हैं। डार्विनवाद यह डार्विन की ही विचारधारा थी कि प्रकृति जन्तु और पौधों का इस प्रकार चयन करती है कि वह जीव जो उस वातावरण में रहने के लिये सबसे अधिक अनुकूलित होते हैं संरक्षित हो जाते हैं और वह जीव जो कम अनुकूलित होते हैं नष्ट हो जाते हैं। प्राकृतिक चयनवाद को समझाने के लिये डार्विन ने अपने…

एक संकर क्रॉस का प्रयोग करते हुए, प्रभाविता नियम की व्याख्या

एक संकर क्रॉस का प्रयोग करते हुए, प्रभाविता नियम की व्याख्या एक ही लक्षण के लिए विपर्यासी पौधे के मध्य संकरण एक संकर क्रॉस कहलाता है, जैसे मटर के लम्बे (T) व बौने (t) पौधे के मध्य कराया गया संकरण। F1 पीढ़ी में सभी पौधे लम्बे किन्तु विषमयुग्मजी (Tt) होते हैं। F1 पीढ़ी में लम्बेपन के लिए उत्तरदायी कारक T, बौनेपन के कारक है पर प्रभावी होता है। कारक अप्रभावी होता है अत: F1 पीढ़ी में उपस्थित होते हुए भी स्वयं को प्रकट नहीं कर पाता है। सभी F1 पौधे लम्बे होते हैं। अत:…

मानव में लिंग निर्धारण कैसे होता है

मानव में लिंग निर्धारण कैसे होता है लैंगिक जनन करने वाले जीव दो प्रकार के होते हैं- द्विलिंगी या उभयलिंगी (bisexual or hermaphrodite) तथा एकलिंगी (unisexual)। एकलिंगी जीवों में नर तथा मादा जनन अंग (reproductive organs) अलग-अलग जन्तुओं में होते हैं। नर तथा मादा की शारीरिक संरचना में अन्तर भी होता है। इसे लिंग भेद (sexual dimorphism) कहते हैं। एकलिंगी जीवों की लिंग भेद प्रक्रिया के सम्बन्ध में मैकक्लंग (Mc Clung, 1902) ने लिंग निर्धारण का गुणसूत्रवाद (chromosomal theory of sex determination) प्रतिपादित किया था। इसके अनुसार लिंग का निर्धारण गुणसूत्रों पर निर्भर करता है तथा इनकी वंशागति मेण्डेल के नियमों के अनुसार होती…

पक्षियों में लिंग निर्धारण किस प्रकार होता है

पक्षियों में लिंग निर्धारण किस प्रकार होता है पक्षियों में लिंग निर्धारण ZW – ZZ गुणसूत्रों द्वारा लिंग निर्धारण (Sex Determination by ZW-ZZ Chromosomes) – यह क्रियाविधि कुछ कीटों (तितली और मॉथ) और कुछ कशेरुकियों (मछलियों, सरीसृपों व पक्षियों) में पायी जाती है। नर में दो समरूपी लिंग गुणसूत्र (hormomorphic sex chromosomes) होते हैं। जिन्हें ZZ से निरूपित किया जाता है। इनसे समयुग्मक (homogametes) उत्पन्न होते हैं। इसके विपरीत मादा में दो विषमरूपी लिंग गुणसूत्र (heteromorphic sex chromosomes) पाये जाते हैं। जिन्हें ZW से प्रदर्शित किया जाता है। इनसे विषमयुग्मक (heterogametes)…

लिंग गुणसूत्रीय ट्राइसोमी पर टिप्पणी

लिंग गुणसूत्रीय ट्राइसोमी पर टिप्पणी क्लाइनेफेल्टर्स सिण्ड्रोम – यह सिण्ड्रोम लिंग गुणसूत्रों की ट्राइसोमी के कारण होता है। इनमें XXY लिंग गुणसूत्र होते हैं। अत: इनमें 47 (44 + XXY) गुणसूत्र होते हैं। इनमें पुरुष व स्त्रियों के लक्षणों का मिश्रण पाया जाता है। Y-गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण इनका शरीर लम्बा व सामान्य पुरुषों जैसा होता है लेकिन अतिरिक्त x गुणसूत्र के कारण इनके वृषण तथा अन्य जननांग व जनन ग्रन्थियाँ अल्प-विकसित होती हैं। इसे हाइपोगोनेडिज्म (hypogonedism) कहते हैं। इनमें शुक्राणुओं का निर्माण नहीं होता अतः ये नर बंध्य (male sterile) होते…

डाउन सिण्ड्रोम किसे कहते हैं व इसके कारण एवं लक्षण

डाउन सिण्ड्रोम किसे कहते हैं व इसके कारण एवं लक्षण यह रोग गुणसूत्रों में संख्या की अनियमितता के कारण होने वाले परिवर्तनों से होता है। मनुष्य में कभी-कभी गुणसूत्रों (chromosomes) की संख्या 46 के स्थान पर 47 हो जाती है। यह अतिरिक्त गुणसूत्र 21वें समजात जोड़े में तीसरा बढ़ जाने के कारण होता है। इसे डाउन संलक्षण (Down’s syndrome) भी कहते हैं। यह अतिरिक्त गुणसूत्र बच्चे की बुद्धि के सामान्य विकास को रोक देता है। संख्या में अधिक गुणसूत्र का कारण प्रायः अण्ड कोशिका (egg cell) के निर्माण में होने…

मेंडल के पृथक्करण के नियम का उपयुक्त रेखाचित्रों की सहायता से वर्णन

मेंडल के वंशागति के नियम मेंडल ने अपने एकसंकर संकरण (monohybrid cross) तथा द्विसंकर संकरण (dihybrid cross) के पश्चात् जो निष्कर्ष निकाले उन्हें मेंडल के आनुवंशिकता के नियम कहते हैं। इनका विस्तृत वर्णन निम्न प्रकार है – 1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance) – “जब एक जोड़ा विपर्यासी लक्षणों को धारण करने वाले दो शुद्ध जनकों में परस्पर संकरण कराया जाता है तो उनकी संतानों में विरोधी में से केवल एक प्रभावी लक्षण परिलक्षित होता है और दूसरा अप्रभावी लक्षण व्यक्त नहीं हो पाता।” उदाहरण – मटर के पौधे में ऊँचाई के…

मनुष्य में लिंग सहलग्न वंशागति का उदाहरण सहित विस्तृत वर्णन

मनुष्य में लिंग सहलग्न वंशागति का उदाहरण सहित विस्तृत वर्णन लिंग सहलग्न लक्षण तथा इनकी वंशागति प्राय: लिंग गुणसूत्रों पर लक्षणों के जो जीन्स होते हैं उनका सम्बन्ध लैंगिक गुणों (sexual characters) से होता है। ये जीन्स ही जन्तु में लैंगिक द्विरूपता (sexual dimorphism) के लिए जिम्मेदार (responsible) होते हैं, फिर भी जन्तुओं का यह गुण अत्यन्त जटिल तथा व्यापक होता है। और इसे निर्मित करने के लिए अनेक ऑटोसोमल जीन्स (autosomal genes) भी प्रभावी होते हैं। दूसरी ओर लिंग गुणसूत्रों पर कुछ जीन्स लैंगिक लक्षणों के अतिरिक्त अन्य लक्षणों…

डीऑक्सीराइबोज शर्करा क्या है व इस शर्करा की अणु संरचना

डीऑक्सीराइबोज शर्करा क्या है व इस शर्करा की अणु संरचना डीऑक्सीराइबोज शर्करा (deoxyribose sugar) DNA में पाई जाती है। यह पाँच कार्बन युक्त (5C) होती है। इसका पाँचवाँ कार्बन परमाणु वलय से बाहर होता है। शर्करा का पहला कार्बन परमाणु हमेशा नाइट्रोजन क्षारक के साथ ग्लाइकोसिडिक बन्ध (glycosidic bond) द्वारा जुड़ा रहता है जबकि तीसरा तथा पाँचवाँ कार्बन परमाणु हमेशा फॉस्फेट अणु के साथ जुड़ता है। दो शर्करा अणु एक-दूसरे के साथ तीसरे कार्बन (3C) तथा पाँचवें कार्बन (5C) के साथ एक फॉस्फेट अणु फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध (phosphodiester bond) द्वारा जुड़े…