{12th Biology}नवडार्विनवाद पर एक टिप्पणी

नवडार्विनवाद पर एक टिप्पणी

नवडार्विनवाद/जैव विकास का आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धांत
वर्ष 1930 तथा 1945 के मध्य आधुनिक खोजों के आधार पर डार्विनवाद में कुछ परिवर्तन सम्मिलित किये गये तथा प्राकृतिक चयनवाद को पुनः मान्यता प्राप्त कराने वालों में वीजमान (Weismann), हैल्डेन (Haldane), जूलियन हक्सले (Julian Huxley), गोल्डस्मिट (Goldschmidt) तथा डॉबजैन्स्की (Dobzhansky) आदि हैं।

डॉडसन (Dodson) के अनुसार, जैव विकास का आधुनिक संश्लेषित मत (moderm synthetic theory of evolution) ही वास्तव में नवडार्विनवाद है। नवडार्विनवाद के अनुसार नयी जातियों की उत्पत्ति निम्नांकित पदों के आधार पर होती है –

  1. विभिन्नताएँ (Variations) – ये जीन विनिमय (crossing over) के कारण, माता-पिता के गुणसूत्रों के लैंगिक जनन में सम्मिलित होने के कारण उत्पन्न होती हैं। केवल ऐसी विभिन्नताएँ जो लाभदायक हों तथा जिनकी वंशागति हो, जैव विकास में सहायक रहती हैं।
  2. उत्परिवर्तन (Mutations) – जीन्स के स्तर पर होने वाले आकस्मिक परिवर्तन जो प्रायः आनुवंशिक होते हैं, उत्परिवर्तन कहलाते हैं।
  3. प्राकृतिक चयन (Natural selection) – बदलती हुई परिस्थितियों में जिन जीवों में लाभदायक विभिन्नताएँ एवं उत्परिवर्तन हो जाते हैं, वे जीव जीवन संघर्ष में अधिक सफल रहते हैं। ये सदैव वातावरण के अनुकूल बने रहते हैं।
  4. लैंगिक पृथक्करण (Sexual Isolation) – क्रियात्मक एवं भौगोलिक कारकों; जैसे- मरुस्थल, पर्वत, समुद्र, नदियों आदि के प्रभाव में प्रायः जीवों के अन्तराजनन में बाधा पहुँचती है।

इस प्रकार जीनी विभिन्नताओं द्वारा जीवों में परिवर्तन (variations) आते हैं। प्राकृतिक वरण (natural selection) तथा जनन पृथक्करण जीवों को अनुकूलित दिशा में ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त तीन सहायक प्रक्रियाएँ-प्रवास (migration), संकरण (hybridization) तथा अवसर (chance) जैव विकास को आगे बढ़ाने, उसका मार्ग तथा दिशा बदलने में सहायक होती हैं। वर्ष 1905 में मेंडलवाद की पुनखज होने तथा जैव विकास में डॉबजैन्स्की (Dobzhansky, 1937) द्वारा आनुवंशिकी को जातियों की उत्पत्ति में महत्व देने पर जैव विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त की नींव पड़ी। ऐसा डार्विनवाद व मंडलवाद के नियमों को जीव-जातियों की समष्टियों (आबादियों) पर एक साथ लागू करने पर सम्भव हुआ। इसे पहले नवडार्विनवाद (neodarwinism) कहा गया।

इस प्रकार “जैव विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त’ की नींव डॉबजैन्स्की (Dobahansky, 1937) की पुस्तक, “आनुवंशिकी तथा जातियों की उत्पत्ति’ (Genetics and the Origin of Species) से पड़ी। यह नाम जूलियन हक्सले (Julian Huxley, 1942) ने दिया। इस सिद्धान्त के विकास में मुलर (Muller, 1949), फिशर (Fisher, 1958), हैल्डेन (Haldane, 1932), राइट (Wright, 1968), मेयर (Mayer, 1963, 1970), स्टेबिन्स (Stebbins, 1966-1976) आदि वैज्ञानिकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इस सिद्धान्त में जैव विकास की क्रिया-विधि को जीव-जातियों की समष्टियों की आनुवंशिकी के सन्दर्भ में समझाया गया है। इसके अनुसार, किसी जीव जाति की विभिन्न क्षेत्रों की समष्टियों में उपस्थित आनुवंशिक अर्थात् जीनी विभिन्नताओं पर प्राकृतिक चयन तथा जननिक पृथक्करण (reproductive isolations) कम करके समष्टियों को नयी-नयी अनुकूलन योग्य दिशाओं की ओर मोड़ते रहते हैं जिससे नयी जातियों का विकास सम्भव होता है।

लघु उविकास तथा वृहत् उदविकास
जैव विकास को लघु उविकास तथा वृहत् उविकास में बाँटा गया है। लघु उविकास में जीव जातियों की प्रत्येक समष्टि में पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते रहने वाले आनुवंशिक (genetic) परिवर्तनों का आंकलन होता है, जबकि वृहत् उविकास में विस्तृत स्तर पर जीवों में नयी-नयी संरचनाओं के विकास, विकासीय प्रवृत्तियों (evolutionary trends), अनुकूलन योग्य प्रसारणों (adaptive radiations), विभिन्न जीव जातियों के मध्य विकासीय सम्बन्धों (phylogenetic relationships) तथा जीव जातियों की विलुप्ति का अध्ययन किया जाता है।

समष्टि या जनसंख्या के प्रत्येक सदस्य में विभिन्न आनुवंशिक लक्षणों के विभिन्न जीनरूप होते हैं। इसके सभी आनुवंशिक लक्षणों के जीनरूपों को सामूहिक रूप में इसका जीन समूह या जीन प्ररूप (genome) कहते हैं। विभिन्न सदस्यों के बीच दृश्यरूप लक्षणों की विभिन्नताओं से स्पष्ट होता है कि इतनी ही विभिन्नताएँ इनके जीन प्ररूपों में भी होनी आवश्यक हैं। इस प्रकार एक समष्टि के सभी सदस्यों में उपस्थित सम्पूर्ण युग्मविकल्पी जीन्स (allelic genes) को मिलाकर समष्टि की जीनराशि (gene pool) कहते हैं। यद्यपि समष्टि के प्रत्येक लक्षण के दो ही युग्मविकल्पी जीन्स होते हैं, परन्तु सामान्यतः उत्परिवर्तनों (mutations) के होते रहने के कारण पूरी समष्टि में प्रत्येक जीन के कई युग्मविकल्पी (allelomorphic) स्वरूप भी हो सकते हैं। इसे जीन की बहुरूपता कहते हैं। इस जीनी बहुरूपता (polymorphism) में प्रत्येक स्वरूप की बारम्बारता अर्थात् आवृत्ति को युग्मविकल्पी आवृत्ति (allelic frequency) कहते हैं जो महत्त्वपूर्ण है। ऐसी जीन्स की विभिन्नताएँ तथा आवृत्तियों में इस प्रकार की विभिन्नताएँ भिन्न-भिन्न स्थानों की समष्टियों के मध्य लघु उविकासीय अपसारिता (micro evolutionary divergence) को प्रदर्शित करती हैं।

आवृत्ति (allelic frequency) कहते हैं जो महत्त्वपूर्ण है। ऐसी जीन्स की विभिन्नताएँ तथा आवृत्तियों में इस प्रकार की विभिन्नताएँ भिन्न-भिन्न स्थानों की समष्टियों के मध्य लघु उविकासीय अपसारिता (micro evolutionary divergence) को प्रदर्शित करती हैं।

हार्डी एवं वीनबर्ग (Hardy and weinberg, 1908) ने स्पष्ट किया कि जिन समष्टियो में आनुवंशिक परिवर्तन नहीं होते, उनमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी युग्मविकल्पी जीन्स और जीनरूपों की आवृत्तियों (frequencies) में एक सन्तुलन बना रहता है, क्योंकि प्रबल जीन अप्रबल जीन को समष्टि की जीनराशि से हटा नहीं सकते। इसे हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन (Hardy-Weinberg equilibrium) कहते हैं।

यह वास्तव में मंडल के प्रथम पृथक्करण अर्थात् युग्मकों की शुद्धता के नियम (law of segregation or purity of gametes) का ही तार्किक निष्कर्ष (logical consequence) है। इसे हार्डी-वीनबर्ग ने गणितीय समीकरणों द्वारा समझाया जिन्हें सम्मिलित रूप से हार्डी-वीनबर्ग का नियम (Hardy-Weinberg rule) कहते हैं। इस नियम में पूर्वानुमान किया जाता है कि समष्टि बड़ी है। इसमें युग्मकों का संयुग्मन (union of gametes) अनियमित तथा संयोगिक (random ) होता है अर्थात् विकास को प्रेरित करने वाली कोई प्रक्रिया समष्टि (आबादी) को प्रभावित नहीं करती है।

विकास के कारण
ऐसी प्रक्रियाएँ जिनके द्वारा किसी समष्टि में हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन (Hardy-Weinberg equilibrium) समाप्त होता है, विकास का कारण होती हैं तथा समष्टि में विकास की दिशा भी निर्धारित करती हैं। इन्हें विकासीय अभिकर्मक कहते हैं। विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त को प्रमुखत: निम्नलिखित विकासीय अभिकर्मकों के आधार पर स्पष्ट किया गया है –
1. उत्परिवर्तन एवं विभिन्नताएँ (Mutations and variations) – जीन्स के रासायनिक संयोजन में परिवर्तनों के कारण होने वाले ये उत्परिवर्तन प्रायः अप्रभावी होते हैं अन्यथा हानिकारक। सामान्यतः इनके घटित होने की दर भी बहुत कम होती है। इस प्रकार लाखों युग्मनजों (zygotes) में से किसी में ही उत्परिवर्तित जीन होता है। कुछ भी हो विकास के लिए आनुवंशिक परिवर्तन स्थापित करने में उत्परिवर्तनों तथा अन्य विभिन्नताओं का काफी महत्त्व होता है, क्योंकि विकासीय प्रक्रिया बहुत लम्बा समय लेती है।

2. देशान्तरण एवं जननिक पृथक्करण (Migration and Genetic Isolation) – अनेक जीव – जातियों में इनकी विभिन्न समष्टियों के बीच इनके सदस्यों का आवागमन होता रहता है। इसे देशान्तरण कहते हैं। इसी प्रकार जब कोई दो समष्टियाँ किसी भौगोलिक अवरोध के कारण अलग-अलग हो गयी हैं और पास-पास आने पर आपस में जनन कर सकती हैं, किन्तु यदि इनमें प्रजनन नहीं हो सकता तो इनको भिन्न-भिन्न जाति मान लिया जाता है। किसी समष्टि में अन्य समष्टियों से आये हुए सदस्य अर्थात् आप्रवासी (immigrants) किसी समष्टि को छोड़कर अन्य समष्टियों में चले जाने वाले सदस्य अर्थात् उत्प्रवासी (emigrants) समागम करके समष्टियों की जीनराशि में नवीन जीन्स ला सकते हैं, हटा सकते हैं अथवा युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियों को बदल सकते हैं।

3. जीनी अपवहन (Genetic Drift) – विभिन्न सदस्यों की प्रजनन दर की विभिन्नता के कारण, जीव जातियों की छोटी-छोटी समष्टियों पर हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन लागू नहीं होता है तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी सभी युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियों को समान रूप से प्रसारण होते रहना प्रायः असम्भव होता है। यह जीनी अपवहन है जिसमें कभी-कभी हानिकारक युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्ति इतनी बढ़ जाती है कि समष्टि के कई सदस्य समाप्त ही हो जाते हैं। इस प्रकार समष्टि और छोटी हो जाती है और इसमें आनुवंशिक विभिन्नताएँ भी बहुत कम रह जाती हैं। कभी-कभी महामारियों (epidemics), परभक्षण (predation) आदि के कारण भी छोटी समष्टियों में जीनी अपवहन हो सकता है।

4. असंयोगिक समागम (Non-Random Mating) – पेड़-पौधों की अनेक जातियों में स्वपरागण (self-pollination) द्वारा प्रजनन होना, मानवों की कुछ जनसंख्याओं में सजातीय विवाह आदि प्रकार के जनन के कारण समयुग्मजी (homozygous) जीनरूपों की संख्या बढ़ती जाती है तथा हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन भी नहीं रहता है।

5. जीवन संघर्ष तथा प्राकृतिक चयन (Struggle for Existance and Natural Selection) – किसी भी समष्टि में प्रत्येक जीव जीवित रहने के लिए भोजन, सुरक्षित स्थान, प्रजनन के लिए साथी की खोज आदि के लिए संघर्षरत रहता है। इसी में से अधिकतम अनुकूलित भिन्नता वाले जीव के चयन को डार्विन (Darwin) ने प्राकृतिक चयन अथवा योग्यतम की उत्तरजीविता (survival of fittest) बताया। इस प्रकार, प्राकृतिक चयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके कारण जीवों की समष्टियों में जीनरूपों तथा युग्मविकल्पी जीन्स, दोनों की ही आवृत्तियों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होते रहते हैं। इस प्रक्रिया में जिस सदस्य के कुल आनुवंशिक लक्षण अथवा जीन प्ररूप (genome) इसे तात्कालिक वातावरणीय दशाओं में, अनुकूलन (adaptation) की अधिक क्षमता प्रदान करते हैं, वह अन्य सदस्यों की तुलना में सफलतापूर्वक जीवन व्यतीत करता है। इससे स्पष्ट है कि प्राकृतिक चयन के कारण, समष्टियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी अधिक लाभदायक लक्षणों के जीनरूपों एवं युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियाँ । अधिकाधिक बढ़ती जाती हैं तथा कम लाभदायक लक्षणों के जीनरूपों और युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियाँ कम होती जाती हैं।

उपर्युक्त सभी प्रक्रियाओं के सम्मिलित प्रभाव से जीव जातियों की प्राकृतिक समष्टियों की जीनराशि में धीरे-धीरे जो परिवर्तन होते हैं, अति महत्त्वपूर्ण हैं। इन्हीं से प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया समष्टि की अनुकूलन योग्य (adaptive) विकासीय दिशा (evolutionary direction) का मार्ग प्रशस्त करती है।

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