{12th Biology}डी०एन०ए० द्विगुणन (replication of DNA) के प्रमुख चरणों का उल्लेख

{12th Biology}डी०एन०ए० द्विगुणन (replication of DNA) के प्रमुख चरणों का उल्लेख

{12th Biology}डी०एन०ए० द्विगुणन (replication of DNA) के प्रमुख चरणों का उल्लेख

{12th Biology}डी०एन०ए० द्विगुणन (replication of DNA) के प्रमुख चरणों का उल्लेख

डी०एन०ए० का द्विगुणन
वाटसन एवं क्रिक (Watson and Crick) ने बताया कि डी०एन०ए० (DNA) एक द्विकुण्डलिनी संरचना है, जो दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं से मिलकर बना है। ये श्रृंखलाएँ प्रतिसप्तान्तर (antiparallel) तथा एक-दूसरे की पूरक (complementary) होती हैं। डी०एन०ए० अणु का द्विगुणन अर्द्धसंरक्षी (semiconservative) होता है। इसका तात्पर्य यह है कि नये बने DNA अणु में एक सूत्र (strand) पैतृक होगा तथा दूसरा सूत्र नवनिर्मित होगा। सन् 1958 में मैथ्यू मेसेल्सन । (Matthew Meselson) तथा फ्रैंकलिन स्टाहल (Franklin Stahl) ने एश्केरीशिया कोलाई (Eischerichia coli = E. coli) नामक जीवाणु के डी०एन०ए० अणु पर ऐसे द्विगुणन की पुष्टि की। डी०एन०ए० के द्विगुणन को हम निम्नलिखित प्रमुख चरणों में बाँट सकते हैं –

1. डी0एन0ए0 अणुओं के पराकुण्डलों का अकुण्डलन एवं पुनर्कुण्डलन (Decoiling and Recoiling of Supercoils of DNA Molecules) – डी०एन०ए० अणुओं के पराकुण्डलन एवं अकुण्डलन का नियमन कुछ विशेष एन्जाइम करते हैं, जिन्हें टोपोआइसोमेरेज (topoisomerase) कहते हैं। द्विगुणन के लिए ये एन्जाइम धीरे-धीरे डी०एन०ए० अणु के छोटे-छोटे स्थानीय खण्डों में इसका पराकुण्डलन समाप्त करके द्विकुण्डलिनी (duplex) को खोलते रहते हैं और द्विगुणन के बाद सन्तति अणुओं का पुनर्कुण्डलन भी करते रहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-टोपोआइसोमेरेज-1 (topoisomerase-I) तथा टोपोआइसोमेरेज-II (topoisomerase-II)।

टोपोआइसोमेरेज-I DNA की द्विकुण्डलिनी के एक सूत्र में कटाव (nick) पैदा करता है, जबकि टोपोआइसोमेरेज-II DNA द्विकुण्डलिनी के दोनों सूत्रों में कटाव उत्पन्न करता है। इसे डी०एन०ए० गाइरेज (DNA gyrase) भी कहते हैं। इन कटावों के बनने से ही स्थानीय अकुण्डलन से शेष द्विकुण्डलिनी में होने वाला घूर्णन (rotation) समाप्त । होता है।

2. द्विकुण्डलिनी का खुलना (Unwinding of Double Helix) – डी०एन०ए० अणु का द्विगुणन कुछ निर्दिष्ट स्थानों पर ही होता है, जिन्हें द्विगुणन मूल (replication origins) कहते हैं। यूकैरियोटिक कोशिकाओं में DNA अपेक्षाकृत लम्बे, रेखीय वे एक से लेकर कई युग्मों (pairs) में होते हैं। प्रत्येक अणु के द्विगुणन के लिए इसमें अनेक द्विगुणन मूल होते हैं। इन द्विगुणन मूल पर कुछ विशेष प्रकार की मूल-बन्धिनी प्रोटीन्स (origin-binding proteins) द्विकुण्डलिनी से जुड़ जाती हैं। यहीं पर विभिन्न प्रकार के प्रोटीन्स व एन्जाइम्स एकत्र होकर द्विगुणन में विविध भूमिकाएँ निभाते हैं।

ई० कोलाई (E. coli) में इन मूल-बन्धिनी प्रोटीन्स को ‘ori C’ का नाम दिया गया है। ये प्रोटीन्स ए०टी०पी० की सहायता से द्विगुणन मूलों के समाक्षारों के युग्मों से H-बन्धों (H-bonds) को हटा देती हैं। द्विगुणने मूल H-बन्धों (H-bonds) के टूटते ही दोहरा हैलिक्स खुल जाता है, इसे डी०एन०ए० अणु का द्रवण (melting) कहते हैं। दोनों कुण्डल के अलग होने से ‘Y’ आकार की चिमटी के समान द्विशाखी, द्विगुणन काँटे (replication fork) जैसी संरचना बन जाती है। प्रत्येक द्विशाख पर एक सूत्र से डी०एन०ए० हेलिकेज (DNA helicase) नामक एन्जाइम का एक बड़ा अणु लिपट जाता है। यह एन्जाइम डी०एन०ए० के सूत्रों को धीरे-धीरे खोलने अर्थात् द्रवण का कार्य करता है।

3. न्यूक्लियोटाइड्स का सक्रियकरण (Activation of Nucleotides) – न्यूक्लियोसाइड एन्जाइम फॉस्फोराइलेज (phosphorylase) तथा ए०टी०पी० की उपस्थिति में सक्रिय हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को फॉस्फोरिलेशन कहते हैं।

4. आर0एन0ए0 प्रवेशक का निर्माण (Formation of RNA Prirmers) – द्विगुणन शाखाओं के बनते ही प्रत्येक द्विशाख पर अलग हुए प्रत्येक DNA सूत्र पर राइबोन्यूक्लियोटाइड (ribonucleotide) अणुओं की एक छोटी अनुपूरक (complementary) श्रृंखला (RNA का छोटा अणु) बन जाती है। इन RNA अणुओं को प्रवेशक (primer) कहते हैं, क्योंकि इन्हीं के 3′ छोरों पर डीऑक्सीराइबो न्यूक्लियोटाइड अणुओं को जोड़कर DNA की एक नयी श्रृंखला का संश्लेषण किया जाता है। आर०एन०ए० प्राइमर का संश्लेषण प्राइमेज (primase) एन्जाइम  या RNA पॉलीमेरेज (RNA polymerase) की सहायता से होता है।

5. डी0एन0ए0श्रृंखला का निर्माण तथा दीर्धीकरण (Formation and Elongation of DNA Chain) – एन्जाइम डी०एन०ए० पॉलीमेरेज-III (DNA polymerase-III) RNA प्राइमर में 5’→3′ दिशा में नये क्षारकों को जोड़ता है। इन क्षारकों का क्रम DNA टेम्पलेट के अनुसार होता है। डी०एन०ए० अणु के दो सूत्र प्रतिसमान्तर होते हैं अर्थात् एक की दिशा 5’→3′ तथा दूसरे की 3′ → 5′ होती है।

एन्जाइम डी०एन०ए० पॉलीमरेज III क्षारकों को केवल 5′ – 3′ दिशा में ही जोड़ सकता है; अत: 3′ – 5′ दिशा वाले DNA टेम्पलेट पर नई DNA श्रृंखला का सतत् निर्माण (continuous synthesis) होता है। ऐसे सूत्र को अगुआ सूत्र या अग्रक रज्जुक (leading strand) कहते हैं। इसके विपरीत जिस नई DNA श्रृंखला का निर्माण 3’→ 5′ दिशा में होता है अर्थात् 5’→3′ दिशा वाले पैतृक सूत्र पर यह असतत् होता है। इस प्रकार यह निर्माण छोटे-छोटे खण्डों के रूप में होता है, ये खण्ड ओकाजाकी खण्ड (Okajaki fragments) कहलाते हैं। इस प्रकार, खण्डों के रूप में हुए निर्माण के कारण इस नये सूत्र को पश्चगामी रज्जुक या पिछुआ सूत्र (lagging strand) कहते हैं। पिछुआ सूत्र के पृथक्-पृथक् टुकड़ों में बनने की प्रक्रिया की खोज रोजी ओकाजाकी (Reiji Okajaki 1968) ने की थी ।

6. आर0एन0ए0 प्रवेशक का हटना (Removal of RNA Primer) – DNA श्रृंखला की लम्बाई बढ़ने के बाद आर०एन०ए०प्रवेशक (RNA primer) श्रृंखला से हट जाता है। आर०एन०ए० प्रवेशक के हटने से उत्पन्न रिक्त स्थान को भरने में डी०एन०ए०पॉलीमेरेज-1 (DNA polymerase-I) सहायता करता है। जब DNA का निर्माण पूरा हो जाता है तो एन्जाइम DNA हेलिकेज की क्रिया रुक जाती है।

डी०एन०ए० का महत्त्व तथा कार्य
न्यूक्लिक अम्लों को जीवन को चलाये रखने का प्रमुख आधार माना जाता है। ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी लक्षणों के प्रकटन से लेकर उन लक्षणों के अन्तर्गत विभिन्न क्रियाओं को उनके निर्दिष्ट तक उचित विधि द्वारा, उचित स्वरूप में तथा नियमित एवं नियन्त्रित अनुक्रियाओं के द्वारा, पहुँचाने का कार्य करते हैं। इस प्रकार –

  1. डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल (DNA) आनुवंशिक सूचनाओं के वाहक का कार्य करता है। तथा सभी आनुवंशिक लक्षणों को पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी में पहुँचाता है।
  2. DNA के द्वारा निर्मित राइबोन्यूक्लिक अम्ल (RNA) विभिन्न अमीनो अम्लों से DNA द्वारा निर्देशित प्रोटीन का संश्लेषण करते हैं जो विभिन्न प्रकार की क्रियाओं-अनुक्रियाओं को होने देने में एन्जाइम्स (enzymes) के रूप में सहायक होती हैं।
  3. DNA के भाग या उसके द्वारा निर्मित कुछ न्यूक्लियोटाइड हॉर्मोन्स (hormones), सह-एन्जाइमों (co-enzymes) आदि के रूप में कार्य करते हैं।
  4. जिस मास्टर योजना (master plan) के अन्तर्गत जन्म से मृत्यु तक किसी जीव में कोशिकाएँ बनती हैं और कार्य करती हैं, उसकी मूल रूपरेखा (original blue print) डी०एन०ए० के रूप में होती है।

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