{12th Biology}डार्विन के जैव विकास के सिद्धान्त का वर्णन

डार्विन के जैव विकास के सिद्धान्त का वर्णन

जैव विकास
प्रारम्भिक निम्न कोटि के सरल जीवों से क्रमिक परिवर्तनों द्वारा, अधिक विकसित एवं जटिल जीवों की उत्पत्ति को जैव विकास कहते हैं।

डार्विनवाद
यह डार्विन की ही विचारधारा थी कि प्रकृति जन्तु और पौधों का इस प्रकार चयन करती है कि वह जीव जो उस वातावरण में रहने के लिये सबसे अधिक अनुकूलित होते हैं संरक्षित हो जाते हैं और वह जीव जो कम अनुकूलित होते हैं नष्ट हो जाते हैं। प्राकृतिक चयनवाद को समझाने के लिये डार्विन ने अपने विचारों को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया –

1. संख्या में तेजी से बढ़ जाने की प्रवृत्ति
प्रत्येक जीव की यह प्रवृत्ति होती है कि वह अपनी संख्या में अधिक से अधिक वृद्धि करे लेकिन उससे उत्पन्न सभी संतानें जीवित नहीं रह पातीं क्योंकि उनकी उत्पत्ति की संख्या ज्यामितीय अनुपात में होती है जबकि रहने और खाने की जगह स्थिर होती है। इसलिये यदि सबसे धीमी गति से प्रजनन करने वाले जीव पर भी प्राकृतिक अंकुश न लगे तो वह पूरी पृथ्वी के भोजन व स्थान को समाप्त कर देगा। इसके लिये उन्होंने सबसे मन्द गति से प्रजनन करने वाले हाथी का उदाहरण लिया, जो लगभग 100 वर्षों तक जीवित रहता है। एक जोड़ा हाथी 30 वर्ष की उम्र में प्रजनन करना शुरू करता है तथा 90 वर्ष तक करता रहता है। इस बीच यह औसतन 6 बच्चों की उत्पत्ति करता है।

उन्होंने हिसाब लगाया कि यदि हाथी की सभी संतानें जीवित रहें तो एक जोड़ा हाथी 740-750 सालों में लगभग 19 मिलियन हाथी पृथ्वी पर पैदा कर देगा। इसी प्रकार यदि एक जोड़ी मक्खी अप्रैल में प्रजनन करना शुरू करती है और उसका प्रत्येक अण्डा जीवित रहे तथा उससे निकली मक्खी पुन: प्रजनन करती रहे तो अगस्त के अन्त तक 191×1018 मक्खियाँ पैदा हो जायेंगी। इसी प्रकार मादा टोड एक बार में 12,000 अण्डे देती है। और यदि वे सब जीवित रहें तो यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि पृथ्वी पर कितने टोड हो जायेंगे। इसी प्रकार एक कवक 65 करोड़ बीजाणु (spores) तथा एक समुद्री सीप 60 लाख अण्डे प्रतिवर्ष देती है।

2. सीमान्त कारक
हमारी पृथ्वी हाथियों से क्यों नहीं रोधी हुई है, हमारे खेत टोड से क्यों नहीं ढके हुए हैं, हमारे तालाब आयस्टर से क्यों नहीं भरे हुए हैं? क्योंकि प्रत्येक जाति को रोकने के लिये कुछ बाधक कारक होते हैं। जिससे उसकी संख्या सीमित हो जाती है। कुछ महत्त्वपूर्ण सीमान्त कारक इस प्रकार से हैं –

  1. सीमित भोज्य सामग्री (Limited Food) – जनसंख्या भोज्य सामग्री की कमी के कारण सीमित हो जाती है। डार्विन इस बात में माल्थस (Malthus) के सिद्धान्त से सहमत थे जिनके अनुसार जनसंख्या ज्यामितीय अनुपात में बढ़ती है और भोज्य सामग्री बहुत धीमी गति से।
  2. परभक्षी जन्तु (Predatory Animals) – परभक्षी जन्तु जनसंख्या पर अंकुश लगाते हैं; जैसे- अफ्रीका के जंगलों से यदि शेर को खत्म कर दिया जाये तो जेब्रा की जनसंख्या उस समय तक इतनी बढ़ जायेगी जब तक कि सीमित भोज्य सामग्री व रोग उनके लिये बाधक न बन जाये।
  3. रोग (Disease) – रोग तीसरा सीमान्त कारक है। जब भी जनसंख्या की अति हो जाती है तो कोई न कोई महामारी इस पर रोक लगा देती है।
  4. स्थान (Space) – स्थान की कमी के कारण भी जनसंख्या की अनियमित वृद्धि रुक जाती है। क्योंकि इसकी वजह से भुखमरी, महामारी हो जाती है तथा प्रजनन भी सीमित हो जाता है।
  5. प्राकृतिक विपदाएँ (Natural Calamities) – जन्तु के अचेत वातावरण में कोई भी बदलाव बाधक बन जाता है; जैसे- सूखा, बाढ़, तूफान, अत्यधिक गर्मी व ठण्ड आदि।

3. जीवन के लिये संघर्ष
यह देखा गया है कि प्रत्येक प्रजाति की प्रत्येक पीढ़ी में अधिक से अधिक व्यष्टि (individuals) उत्पन्न करने की प्रवृत्ति होती है जो उपरोक्त दिये गये सीमान्त कारकों से सीमित हो जाती है- जैसे खाना, साथी, स्थान आदि के लिये होड़ (competition), परभक्षी जन्तु, रोग तथा प्राकृतिक विपदाएँ। इस प्रक्रिया को डार्विन ने जीवन के लिये संघर्ष (struggle for existence) कहा। यही संघर्ष निर्णय करता है कि कौन-सी व्यष्टि सफल होगी और कौन-सी नहीं।

जीवन के लिये संघर्ष तीन तरह से हो सकते हैं –
(i) सजातीय संघर्ष (Intraspecific Struggle) – अपने ही तरह की अर्थात् एक ही जाति के सदस्यों में आपस में होने वाले संघर्षों को सजातीय संघर्ष (intraspecific struggle) कहते हैं। जंगल में एक ही पेड़ के नीचे उगे उसी जाति के छोटे-छोटे पौधे इसका अच्छा उदाहरण हैं, उन पौधों में से कुछ मिट्टी तथा नमी की कमी से मर जाते हैं तथा बचे हुए पौधों में से कुछ लम्बे होकर अविकसित छोटे पौधों की हवा व रोशनी रोक देते हैं जिसके कारण छोटे पौधे खत्म हो जाते हैं। इस प्रकार उस क्षेत्र में पेड़ों की संख्या लगातार गिरती रहती है तथा कुछ ही पौधे परिपक्व हो पाते हैं।

(ii) अन्तरजातीय संघर्ष (Interspecific Struggle) – प्रकृति में सबसे अधिक संघर्ष अन्तरजातीय होता है अर्थात् एक साथ रहने वाली विभिन्न जातियों के बीच संघर्ष। एक जाति दूसरे जाति का भोजन बन जाती है। मनुष्य इस प्रकार के संघर्ष में सबसे अग्रणी है। जो जीव इस संघर्ष में खत्म हो जाते हैं वे अपने इस नुकसान को या तो पूरा करते हैं या खत्म हो जाते हैं।

(iii) वातावरणीय संघर्ष (Environmental Struggle) – सभी जातियाँ प्रतिकूल वातावरण; जैसे- अत्यधिक सर्दी व गर्मी, बाढ़, सूखा, तूफान आदि से अपने आपको बचाने के लिये लगातार संघर्ष करती रहती हैं।

4. विभिन्नताएँ
यह बात सर्वविदित है कि दो जीव कभी भी एक से नहीं हो सकते। एक ही माता-पिता की दो संतानें भी कभी एक-सी नहीं होतीं, इसी को विभिन्नताएँ (variations) कहते हैं। विभिन्नताएँ जैव विकास की एक मूल आवश्यकता तथा प्रगामी कारक हैं क्योंकि बिना विभिन्नताओं के जैव विकास नामुमकिन है। विभिन्नताएँ दो प्रकार की होती हैं-एक तो वह जो पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागत हो जाती हैं तथा दूसरी वह जो केवल उस जीव के जीवन काल में ही होती हैं लेकिन वंशागत नहीं होतीं।

5. योग्यतम की उत्तरजीविता
हरबर्ट स्पेन्सर (Herbert Spencer) ने योग्यतम की उत्तरजीविता का सिद्धान्त सामाजिक विकास के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। डार्विन इससे अत्यधिक प्रभावित हुए तथा उन्होंने इसे जैव विकास के प्राकृतिक चयन के सम्बन्ध में समझाया। डार्विन के अनुसार जीवन के संघर्ष में वही जीव सफल होते हैं जो वातावरण के अनुरूप अनुकूलित हो जाते हैं। यह अधिक सफल जीवन व्यतीत करते हैं, इनकी जनन क्षमता भी अधिक होती है तथा यह स्वस्थ संतानों को उत्पन्न करते हैं, जिससे उत्तम लक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागत हो जाते हैं और इस प्रकार उत्पन्न संताने वातावरण के प्रति अधिक अनुकूल होती हैं। इसके साथ ही वातावरण के प्रतिकूल प्राणी नष्ट हो जाते हैं इसी को डार्विन ने प्राकृतिक वरण या चयन (natural selection) कहा।

डार्विन ने प्राकृतिक वरण द्वारा योग्यतम की उत्तरजीविता को लैमार्क के जिराफ द्वारा समझाया। जिराफ की गर्दन तथा पैरों की लम्बाई में अत्यधिक विभिन्नताएँ होती हैं। घास के मैदानों की कमी के कारण इन्हें ऊँचे पेड़ों की पत्तियों पर निर्भर होना पड़ा जिसके फलस्वरूप वह जिराफ जिनमें लम्बी गर्दन व टाँगें थीं, वह छोटी गर्दन व टाँगों वाले जिराफ से ज्यादा अनुकूलित पाये गये। लंबी गर्दन वाले जिराफ को उत्तरजीविता का अधिक अवसर मिला तथा वह संख्या में बढ़ने लगे तथा छोटी गर्दन वाले जिराफ लुप्त हो गये।

6. नयी जाति की उत्पत्ति
वातावरण निरन्तर परिवर्तित होता रहता है जिससे जीवों में उनके अनुकूल रहने के लिए विभिन्नताएँ आ जाती हैं। यह विभिन्नताएँ पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों में इकट्ठा होती रहती हैं। धीरे-धीरे वह अपने पूर्वजों से इतने भिन्न हो जाते हैं कि वैज्ञानिक उन्हें नई जाति (species) का स्थान दे देते हैं। इसी के आधार पर डार्विन ने जाति के उद्भव का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

Related posts

Leave a Comment