{12th Biology}गर्भ झिल्लियों का विस्तृत वर्णन (Full Details)

Que — गर्भ झिल्लियों का विस्तृत वर्णन

Ans– गर्भ झिल्लियाँ
भ्रूण की देह के बाहर विकसित होने वाली झिल्लियाँ अथवा कलाओं (membranes) को भ्रूण-बहिस्थ कलाएँ कहते हैं। ये भ्रूण के परिवर्द्धन एवं जीवन के लिए विशेष कार्य करती हैं, परन्तु भ्रूण के अंगोत्पादन में भाग नहीं लेतीं। जन्म अथवा डिम्बोद्गमन के समय इनका निष्कासन हो जाता है। मानव तथा अन्य सभी स्तनियों, सरीसृपों, पक्षियों में चार भ्रूण-बहिस्थ कलाएँ या गर्भ झिल्लियाँ निर्मित होती हैं। ये चार भ्रूणीय-बहिस्थ कलाएँ इस प्रकार हैं –
1. उल्व (Amnion) – यह कला भ्रूण को चारों ओर से घेरे रहती है। भ्रूण के चारों ओर की इस गुहा को उल्व गुहा (amniotic cavity) कहते हैं। इस गुहा में एक तरल भरा रहता है जिसे उल्व तरल या एम्निऑटिक तरल (amniotic fluid) कहते हैं। इस तरल में मन्द गति होती रहती है जिसके कारण भ्रूण के अंग परस्पर चिपकते नहीं। इस प्रकार, एम्निऑटिक तरल भ्रूण के अंगों में विकृतियाँ उत्पन्न होने से बचाता है। यह निम्नलिखित कार्य करता है –

  • एम्निऑटिक तरल भ्रूण की बाह्य आघातों से रक्षा करता है।
  • एम्निऑन भ्रूण को कवच एवं भ्रूण-बहिस्थ कलाओं से पृथक् रखकर इनसे चिपकने से रोकता है।
  • एम्निऑटिक तरल में डूबे रहने से भ्रूण के सूखने (desiccation) का भय नहीं होता।
  • एम्निऑटिक तरल में होने वाली मन्द गति के कारण अंग आपस में चिपकते नहीं।

2. चर्मिका (Chorion) – कॉरिऑन में वृद्धि तीव्र गति से होती है। यह एम्निऑन के बाहर की ओर निर्मित होती है। कॉरिऑन जरायु (placenta) का निर्माण करती है। एम्निऑन तथा कॉरिऑन के बीच की गुहा को कॉरिऑनिक गुहा (chorionic cavity) कहते हैं। कॉरिऑन की एक्टोडर्म या ट्रोफोब्लास्ट की बाह्य सतह पर दीर्घ अंकुर उत्पन्न होते हैं जिन्हें कॉरिऑनिक अंकुर (chorionic villi) कहते हैं। ये अंकुर गर्भाशय की भित्ति में धंस जाते हैं। ये रसांकुर भ्रूण के पोषण, श्वसन तथा उत्सर्जन में सहायक हैं।

कॉरिऑन से एक हॉर्मोन, कॉरिओनिक गोनैडोट्रॉपिन का स्रावण होता है, जो प्लैसेण्टा विकसित होने तक डिम्ब ग्रन्थि में कॉर्पस ल्यूटियम को सक्रिय रखता है।

3. पीतक कोष (Yolk Sac) – मानव का पीतक कोष छोटा होता है और यह भ्रूण-बहिस्थ गुहा द्वारा चर्मका से पृथक् रहता है। स्तनियों के भ्रूण में पीतक नहीं होता है। पीतक कोष में रुधिर निर्माण होता है। विकास की अन्तिम प्रावस्थाओं में जब अपरापोषिका विकसित हो जाती है, तब पीतक कोष छोटा होने लगता है और धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

4. अपरापोषक या एलैण्टोइस (Allantois) – मानव के भ्रूण में अपरापोषक एक अवशेषी अंग के रूप में होती है। अन्य स्तनियों में अपरापोषक स्प्लैंकनोप्ल्यूर (एण्डोडर्म एवं स्प्लैंकनिक मीसोडर्म) से निर्मित होती है। स्प्लैंकनिक मीसोडर्म कॉरिऑन के मीसोडर्म स्तर के सम्पर्क में आकर इससे समेकित (fuse) हो जाती है। इस प्रकार, एक मिश्रित भित्ति निर्मित होती है जिसे एलैण्टोकोरिऑन (allantochorion) कहते हैं। एलैण्टोकॉरिऑन, एलैण्टॉइक प्लैसेण्टा की उत्पत्ति में भाग लेती है।

पीतक कोष एवं एलैण्टोइस के वृन्त संयुक्त रूप से नाभि रज्जु (umbilical cord or belly stalk) निर्मित करते हैं।

स्तनधारियों में एलैण्टोइस मूत्राशय का कार्य नहीं करती, क्योंकि भ्रूण के उत्सर्जी पदार्थों का माँ के रुधिर परिवहन में विसरण हो जाता है एवं माँ के वृक्कों के द्वारा इनका उत्सर्जन होता है। एलैण्टोइस का रुधिर परिवहन तन्त्र भ्रूण को ऑक्सीजन एवं पोषण प्रदान कराता है।

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