निषेचन क्रिया किसे कहते हैं? मनुष्य में निषेचन में होने वाली क्रियाओं का उल्लेख

निषेचन क्रिया किसे कहते हैं? मनुष्य में निषेचन में होने वाली क्रियाओं का उल्लेख

निषेचन क्रिया किसे कहते हैं? मनुष्य में निषेचन में होने वाली क्रियाओं का उल्लेख

Que — निषेचन क्रिया किसे कहते हैं? मनुष्य में निषेचन में होने वाली क्रियाओं का उल्लेख कीजिए तथा अण्डाणु में शुक्राणु के प्रवेश का नामांकित चित्र बनाइए।

— निषेचन क्रिया
मनुष्य के जीवन चक्र में प्रत्यक्ष भ्रूणीय विकास होता है। यह भ्रूणीय विकास माता के गर्भाशय (uterus) में होता है।

मनुष्य के भ्रूणीय विकास का प्रारम्भ निषेचन से होता है। मनुष्य में निषेचन (fertilization) फैलोपियन नलिका (fallopian tube) में होता है। इस क्रिया में फैलोपियन नलिका में मैथुन (सम्भोग) के समय पुरुष द्वारा छोड़े हुए वीर्य में उपस्थित शुक्राणुओं (sperms) में से एक अगुणित शुक्राणु (haploid sperm) एक अगुणित अण्डाणु (haploid ovum) से समेकित (fuse) हो जाता है और एक द्विगुणित रचना युग्मनज (zygote) बनाता है। समेकन की इस क्रिया को निषेचन कहते हैं।

निषेचन क्रिया में मादा युग्मक या अण्डाणु सम्पूर्ण रूप में किन्तु नर युग्मक अर्थात् शुक्राणु का केवल केन्द्रक (nucleus = n) ही भाग लेता है। मैथुन से निषेचन तक की वास्तविक क्रिया के निम्नलिखित चरण होते हैं –
1. शुक्राणु का अण्डाणु की ओर पहुँचना – मादा की योनि में नर के द्वारा स्खलित वीर्य में से कुछ सफल शुक्राणु (sperms) अपनी पूँछ की सहायता से 1-4 मिमी प्रति मिनट की गति से फैलोपियन नलिका में पहुँचते हैं। इस कार्य में गर्भाशय की सीरिंज अवशोषण क्रिया तथा क्रमाकुंचन गति इन्हें ऊपर चढ़ने में सहायक होती है। फैलोपियन नलिका में संकुचन की उत्तेजना वीर्य में उपस्थित प्रोस्टाग्लाण्डिस तथा ऑक्सीटोसिन की उपस्थिति से प्रेरित होती है।

2. समूहन प्रक्रिया – मैथुन के पश्चात् जब अण्डाणु और शुक्राणु समीप आते हैं तब अण्डाणु फर्टीलाइजिन तथा शुक्राणु एण्टीफर्टीलाइजिन नामक पदार्थ का स्राव करता है। एण्टीफर्टीलाइजिन फर्टीलाइजिन की ओर आकर्षित होता है, जिसके फलस्वरूप अण्डाणु शुक्राणु की ओर आता है और इनका समूहन होता है। अब तक स्रावों की मात्रा कम हो जाने से अण्डे तक पहुँचने वाले शुक्राणुओं की संख्या कम होती जाती है।
स्त्री के जनन नाल में शुक्राणु 1-5 दिन तक जीवित रह सकते हैं किन्तु ये स्खलन के 12-24 घण्टों की अवधि में अण्डाणु का निषेचन कर सकते हैं।

3. संधारण – वीर्य योनि की अम्लीयता को समाप्त करके शुक्राणुओं को अण्डाणु का निषेचन करने में सहायक होते हैं। इस प्रक्रिया को संधारण कहते हैं। सामान्यत: केवल एक शुक्राणु ही अण्डाणु में प्रवेश कर पाता है। वह क्षेत्र जहाँ से ध्रुवकाय (polar body) के बाहर निकलने पर शुक्राणु इसमें प्रवेश करता है उसे सक्रिय ध्रुव (active pole) कहते हैं। अण्डाणु की सतह पर स्थित कुछ ग्राहियों की सहायता से शुक्राणु का शीर्ष अण्डाणु की सतह से चिपक जाता है।

4. शुक्राणु द्वारा अण्डाणु का बेधन – अण्डाणु की सतह से चिपकने के बाद शुक्राणु का एक्रोसोम (acrosome) स्पर्म लाइसिन (sperm lysin) नामक एन्जाइम का स्राव करता है। इसमें हाइल्यूरोनिडेज (hyaluronidase) तथा प्रोटियेज (protease) एन्जाइम्स होते हैं। ये । एन्जाइम अण्डाणु के कोरोना रेडिएटा तथा जोना पेलुसिडा को विघटित करके शुक्राणु को अण्डाणु में प्रवेश के लिये मार्ग बनाते हैं। जैसे ही शुक्राणु अण्डाणु में प्रवेश करता है अण्डाणु में कुछ ऐसे परिवर्तन हो जाते हैं, जिससे दूसरा शुक्राणु इसमें प्रवेश नहीं कर सकता। शुक्राणु की पूँछ अण्डाणु में प्रवेश नहीं करती है। अण्डाणु के चारों ओर हाइल्यूरोनिक अम्ल द्वारा चिपकी फॉलिकल कोशिकाओं का अपघटन करने के लिए शुक्राणु हाइल्यूरोनिडेज (hyaluronidase) एन्जाइम स्रावित करता है। इससे सम्पर्क स्थल पर अण्डे के बाहरी आवरण कोरोना रेडियेटा (corona radiata) तथा जोना पेलुसिडा (zona pellucida) नष्ट हो जाते हैं।

शुक्राणु के सम्पर्क स्थल पर अण्डाणु की बाहरी दीवार (भित्ति) फूलकर एक निषेचन शंकु (fertilization cone) बनाती है। अण्डाणु की प्लाज्माकला से चिपकने के पश्चात् शुक्राणु का एक्रोसोम स्पर्म लाइसिन एन्जाइम स्रावित करता है। इसके द्वारा अण्डाणु की प्लाज्मा कला घुल जाती है और शुक्राणु धीरे-धीरे अण्डाणु में प्रवेश कर जाता है।

5. अण्डाणु का सक्रियण – शुक्राणु के प्रवेश करते ही अण्ड कोशिका से एक रासायनिक संकेत अण्डाणु की सतह की ओर प्रेषित होता है, जिसके कारण अण्डकोशिका के चारों ओर स्थित शुक्राणुओं में से कोई भी शुक्राणु अब अण्डाणु में प्रवेश नहीं करने पाता है। अण्डाणु की प्लाज्माकला के नीचे स्थित कॉर्टिकल कणिकाएँ निषेचन झिल्ली बनाती हैं। इसे अण्डाणु का सक्रियण कहते हैं। निषेचन झिल्ली अन्य शुक्राणुओं को अण्डाणु में प्रवेश करने से रोक देती है।

6. शुक्राणु तथा अण्डाणु के केन्द्रक का संलयन – शुक्राणु के अण्डे में प्रवेश करते ही उसके कोशिकाद्रव्य एवं कॉर्टेक्स में अनेक परिवर्तन होने लगते हैं। इन परिवर्तनों के कारण सक्रिय अण्डाणु में समसूत्री विभाजन (mitosis) की तैयारियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं।

अण्डाणु के अन्दर शुक्राणु का नर पूर्व केन्द्रक (male pronucleus) एक निश्चित पथ पर अण्डाणु के मादा पूर्व केन्द्रक (female pronucleus) की ओर अग्रसर होता है। इस पथ को शुक्राणु प्रवेश पथ (sperm penetration path) कहते हैं। अब नर एवं मादा पूर्व केन्द्रकों का परस्पर स्थापित हो जाने से दोनों का संलयन (fusion) हो जाता है, जिसके फलस्वरूप युग्मनज (zygote) बनता है, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या पुनः द्विगुणित (2n) हो जाती है। इसके साथ ही माता-पिता के गुणसूत्रों का परस्पर मिश्रण हो जाता है।

निषेचित अण्डे को अब युग्मनज (zygote) तथा इसके केन्द्रक को सिन्कैरिओन (synkaryon) कहते हैं। दोनों पूर्व केन्द्रकों के संलयन को उभय मिश्रण (amphimixis) कहते हैं। सेण्ट्रिओल सहित शुक्राणु केन्द्रक के प्रवेश से अण्डाणु के कोशिकाद्रव्य में तर्क निर्माण प्रारम्भ हो जाता है और युग्मनज प्रथम केन्द्रक विभाजन के लिए तैयार हो जाता है।

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